Bail Provisions – ट्रायल की कछुआ चाल पर सुप्रीम कोर्ट ने ईडी को फटकारा
Bail Provisions: किसी केस में ट्रायल की चाल नौ दिन चले अढ़ाई कोस वाली हो लेकिन कड़े कानून की वजह से आरोपी जेल में सड़ता रहे, अब ये नहीं चलेगा। प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (पीएमएलए), यूएपीए यानी अनलॉफुल एक्टिविटीज (प्रिवेंशन) एक्ट, एनडीपीएस एक्ट यानी नार्कोटिक्स ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटैंसेज एक्ट, इन सभी कानूनों में एक समानता है। इनके प्रावधान बेहद सख्त हैं यानी कड़े कानून हैं। इनमें जमानत की शर्तें इतनी कड़ी हैं कि इसकी धाराएं लगी नहीं कि लंबे समय तक जेल में सड़ना तय है। अभियोजन को ये साबित नहीं करना होता कि आरोपी दोषी है बल्कि आरोपी को साबित करना पड़ता है कि वह बेगुनाह है लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि ऐसे कानूनों में जमानत की कड़ी शर्तों का इस्तेमाल किसी आरोपी को लंबे समय तक जेल में रखने के औजार के तौर पर नहीं किया जा सकता।

मुकदमे के जल्द निपटान जरूरी
सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाते हुए कहा कि पीएमएलए, यूएपीए और एनडीपीएस जैसे कड़े कानूनों में जमानत के सख्त नियमों का इस्तेमाल किसी आरोपी को लंबे समय तक जेल में रखने के हथियार के तौर पर नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि मुकदमे के जल्द निपटारे की शर्त को इन कानूनों में भी शामिल किया जाना चाहिए। ऐसा इसलिए क्योंकि मुकदमे के खत्म होने में बहुत देरी और जमानत के लिए कड़ी शर्तें, दोनों एक साथ नहीं चल सकतीं। जस्टिस अभय एस. ओका और जस्टिस ऑगस्टाइन जॉर्ज मसीह की बेंच ने कहा कि सरकार को उन कानूनों पर नए सिरे से विचार करना चाहिए, जहां आरोपी को अपनी बेगुनाही साबित करने का जिम्मा होता है।
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बालाजी पर मनी लॉन्ड्रिंग केस में मामला
कोर्ट तमिलनाडु के पूर्व मंत्री सेंथिल बालाजी की जमानत याचिका पर सुनवाई कर रही थी। बालाजी पर मनी लॉन्ड्रिंग केस में मामला दर्ज है, जो 2011-2016 के दौरान एआईएडीएमके सरकार में परिवहन मंत्री रहते हुए नौकरी के बदले पैसे लेने के घोटाले से जुड़ा है। कोर्ट ने माना भी कि पहली नजर में सेंथिल बालाजी के खिलाफ पुख्ता सबूत हैं। उनके खिलाफ प्रथम दृष्टया मामला बनता है लेकिन कोर्ट ने उन्हें यह कहते हुए जमानत दे दी कि बालाजी पहले ही 15 महीने जेल में बिता चुके हैं। इस मामले में 2,000 आरोपी और 500 गवाह हैं, इसलिए निकट भविष्य में ट्रायल के खत्म होने की कोई संभावना नहीं है।

सॉफ्ट फाइलों की प्रामाणिकता पर संदेह
बालाजी के खिलाफ सबूतों की जांच करते हुए, कोर्ट ने कहा कि इस स्तर पर सॉफ्ट फाइलों की प्रामाणिकता पर संदेह करने का कोई कारण नहीं है। उनके बैंक खाते में 1।34 करोड़ रुपये की नकद राशि जमा होने का प्रथम दृष्टया सबूत भी है। कोर्ट ने कहा, ‘इस स्तर पर, एमएलए के रूप में मिलने वाला वेतन और कृषि आय जमा करने के बारे में अपीलकर्ता के दावे को स्वीकार नहीं किया जा सकता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि एमएलए के रूप में अपीलकर्ता की नकद आय और कृषि आय के अस्तित्व को दर्शाने के लिए कोई प्रथम दृष्टया सबूत नहीं है।
इसलिए, इस स्तर पर, यह कहना बहुत मुश्किल होगा कि अपीलकर्ता के खिलाफ कोई प्रथम दृष्टया मामला नहीं है।जस्टिस ओका और जस्टिस मसीह ने कहा कि ईडी को जमानत के सख्त प्रावधान धारा 45(1)(ii) का इस्तेमाल किसी आरोपी को लंबे समय तक हिरासत में रखने के लिए एक औजार के रूप में इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं दी जा सकती है। बालाजी पर कड़ी शर्तें लगाते हुए कोर्ट ने कहा कि उन्हें हर सोमवार और शुक्रवार को ईडी के सामने पेश होना होगा। इसके साथ ही भ्रष्टाचार और मनी लॉन्ड्रिंग के मामलों में सुनवाई कर रही अदालतों में भी उन्हें मौजूद रहना होगा।
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कानूनों में जमानत देने कड़े प्रावधान
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसे कानूनों में अपराधों की गंभीरता को देखते हुए, मुकदमों के जल्द निपटारे की परिकल्पना की गई है। इसके अलावा, ऐसे कानूनों में जमानत देने के लिए कड़ी शर्तों के प्रावधान हैं। हमारे आपराधिक न्यायशास्त्र का यह एक सुस्थापित सिद्धांत है कि जमानत नियम है और जेल अपवाद। जमानत देने के संबंध में ये कड़े प्रावधान, जैसे कि पीएमएलए की धारा 45(1)(iii), एक ऐसा उपकरण नहीं बन सकता जिसका उपयोग आरोपी को अतार्किक रूप से लंबे समय तक बिना मुकदमे के जेल में बंद करने के लिए किया जा सके।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बिना मुकदमे के लंबे समय तक जेल में रखना आरोपी के अधिकारों का उल्लंघन है। अदालत को उसकी रक्षा के लिए हस्तक्षेप करना चाहिए और कोई भी प्रावधान संवैधानिक अदालतों की शक्ति को छीन नहीं सकता है कि वे मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के आधार पर जमानत दे सकें। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, ‘जब पीएमएलए के तहत शिकायत का मुकदमा उचित सीमा से आगे बढ़ने की संभावना हो, तो संवैधानिक न्यायालयों को जमानत देने की अपनी शक्तियों का प्रयोग करने पर विचार करना होगा। इसका कारण यह है कि धारा 45 (1)(ii) राज्य को किसी आरोपी को अनुचित रूप से लंबे समय तक हिरासत में रखने का अधिकार नहीं देता है, खासकर तब जब उचित समय के भीतर मुकदमे के समाप्त होने की कोई संभावना न हो।’
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