Electronic Voting Machine: 1982 में केरल में किया गया पहला प्रयोग
देश में कई पार्टियों ने एक बार फिर चुनावों में ईवीएम से छेड़छाड़ का मुद्दा उठाया है। लोकसभा चुनाव से पहले कांग्रेस नीत इंडिया गठबंधन में ईवीएम से वोटिंग कराने के बजाय मतपत्र से मतदान कराने की मांग जोर पकड़ रही है। विपक्ष को ईवीएम पर विश्वास नहीं है और वह परिणामों को लेकर आशंकित है। भारत में बहुत वर्षों तक चुनाव मतदान पत्र से कराए जाते रहे हैं, लेकिन यह प्रक्रिया काफी महंगी, धीमी और पर्यावरण विरुद्ध थी।
इस कारण देश में पहली बार ईवीएम का प्रयोग 1982 में केरल की पारुर विधानसभा क्षेत्र में किया गया। इसके बाद 1999 के लोकसभा चुनावों में ईवीएम का प्रयोग सीमित निर्वाचन क्षेत्रों में किया गया। 2004 के लोकसभा चुनाव के बाद से भारत में प्रत्येक लोकसभा और राज्य विधानसभा चुनाव में मतदान की प्रक्रिया पूरी तरह से ईवीएम द्वारा ही संपन्न कराई जा रही है।

विकसित देशों में मतपत्र का इस्तेमाल
ईवीएम का इस्तेमाल भारत के अलावा ब्राजील, फिलीपींस, बेल्जियम, एस्टोनिया, संयुक्त अरब अमीरात, वेनेजुएला, जॉर्डन, मालदीव, नामीबिया, नेपाल, भूटान मिस्र में किया जा रहा है। भारत के सिर्फ विपक्षी दल ही नहीं, तमाम विकसित देशों में अविश्वास के चलते उसे प्रतिबंधित कर दिया गया है या मतपत्र इस्तेमाल में लाए जाते हैं। बता दें कि दुनिया के कई देशों ने ईवीएम यानी इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों पर बैन लगा रखा है।
इसमें जर्मनी, नीदरलैंड और अमेरिका जैसे देश भी शामिल हैं। इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों का इस्तेमाल कई देशों ने शुरू किया था। लेकिन सिक्योरिटी और एक्यूरेसी को लेकर इन मशीनों पर सवाल उठने लगे। इंग्लैंड, फ्रांस, जर्मनी, नीदरलैंड और अमेरिका जैसे विकसित देशों में ईवीएम से चुनाव नहीं होते हैं। इनमें नीदरलैंड, इटली में ईवीएम पर बैन है, तो जर्मनी, इंग्लैंड और फ्रांस में कभी ईवीएम का इस्तेमाल नहीं हुआ।
वापस बैलट बॉक्स में आया जापान
अमेरिका के कई राज्यों में बिना पेपर ट्रेल वाली ईवीएम पर बैन है। जापान में 2002 में विशेष कानून के माध्यम से स्थानीय चुनावों में ईवीएम से वोटिंग शुरू हुई। सरकार ने विश्वास जताया गया था की ईवीएम से चुनावों में पारदर्शिता को बढ़ावा मिलेगा, लेकिन ऐसा हो न सका। ईवीएम के महंगे होने और पारदर्शी ना होने से 2016-17 में वापस बैलट बॉक्स से मतदान कराने का फैसला किया गया।
बांग्लादेश में इस साल जनवरी में हुए 12वें संसदीय चुनावों में ईवीएम का इस्तेमाल नहीं किया गया। यह फैसला प्रमुख विपक्षी राजनीतिक दलों द्वारा ईवीएम के इस्तेमाल के खिलाफ कड़े विरोध के बाद पिछले साल आया था। बांग्लादेश में विपक्ष ने सत्तारूढ़ दल पर पिछले चुनावों में धांधली का आरोप लगा भविष्य में चुनावी धोखाधड़ी से बचने के लिए एक गैर-पक्षपातपूर्ण सरकार की स्थापना की मांग की थी।

2,000 वोट रिकॉर्ड किए जा सकते हैं अधिकतम
ईवीएम में अधिकतम 2,000 वोट रिकॉर्ड किए जा सकते हैं। ईवीएम को चलाने के लिए बिजली की जरूरत नहीं है, क्योंकि इनमें बैटरी बैक-उप की व्यवस्था होती है। इन मशीनों की मदद से उन इलाकों में भी चुनाव कराया जा सकता है, जहां पर बिजली नहीं होती है। एक ईवीएम मशीन में नोटा सहित अधिकतम 64 उम्मीदवारों के लिए वोट डाले जा सकते हैं। हालांकि साधारणतः इसमें 16 उम्मीदवारों के चुनाव चिन्ह का ही प्रावधान होता है, लेकिन जरूरत के अनुसार मतपत्र इकाइयां संलग्न की जा सकती हैं।
एम-ईवीएम की कीमत प्रति यूनिट लगभग 17,000 रु। है। 31 देशों में ईवीएम को इस्तेमाल किया गया, जिनमें से केवल चार इसे पूरे देश में इस्तेमाल में लाते हैं। 11 देशों में इसे देश के कुछ हिस्सों या कम महत्वपूर्ण चुनावों में इस्तेमाल किया जाता है। 3 देशों जर्मनी, नीदरलैंड और पुर्तगाल ने ईवीएम का इस्तेमाल बंद कर दिया है, जबकि 11 देशों ने पायलट प्रोजेक्ट के बाद बंद करने का फैसला लिया।
अनेक देश भारत से खरीदते हैं EVM
भारत में ईवीएम का निर्माण भी होता है। ईवीएम को बेंगलुरु के भारत इलेक्ट्रॉनिक लिमिटेड और दूसरा हैदराबाद के इलेक्ट्रॉनिक कॉर्प ऑफ इंडिया में बनाया जाता है। भारत निर्मित ईवीएम को खरीदने वाले देशों में नेपाल, नामीबिया, केन्या और भूटान शामिल है। भारत में ईवीएम पर उठे सवालों के चलते चुनाव आयुक्त ने सुझाव दिया था, यदि मशीन में पेपर ट्रेल यानी व्यवस्था की जाए तो सवालों पर विराम लग सकता है।
पेपर ट्रेल यानी वोट देने के बाद उसकी पर्ची दी जाए। ईवीएम के समर्थन में तर्क दिया जाता है कि भारत के चुनावों में इस्तेमाल हो रहे EVM’s में इंटरनेट, ब्लूटूथ के जरिए छेड़छाड़ संभव नहीं है। इसको दूसरी मशीनों से अलग रखा जाता है। इन मशीनों में अब VVPAT का भी इंतजाम किया गया है। बता दें कि ईवीएम पर उठ रहे इन सवालों से पहले भी कई बार देश में ईवीएम पर विवाद हो चुका है। सत्ताधारी बीजेपी के ही वरिष्ठ नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने साल 2009 में ईवीएम पर सवाल उठाया था। हालांकि, स्वामी तब बीजेपी में नहीं थे और देश में कांग्रेस की सरकार थी।


